मानव – सभ्यता ने जब पहली बार अपनी आंखें खोली और सुदूर गगनमंडल में उसने ग्रहों, नक्षत्रों, और तारों को चमकते हुए देखा, साथ ही उसने देखा की ये सभी ग्रह अपने एक निश्चित समय में गतिशील है तो उनका रहस्य जानने के लिए वह उत्कंठित हो उठा । उसने यह भी देखना चाहा की यह क्या है ? ये क्यों गतिशील है ? और इनका मानव से किसी प्रकार का सम्बन्ध है ?
प्रारम्भ में उसने उसने उन नक्षत्रों और ग्रहों को देवता माना और इसी रूप में उनकी पूजा करनी प्रारम्भ की । वेदों में सूर्य और चन्द्रमा को देवता की संज्ञा देकर उन्हें पूर्ण सम्मान दिया गया है ।
परन्तु धीरे-धीरे मानव – सभ्यता विकसित होती गई और जान उसने गणित का ज्ञान प्राप्त किया तो उसने पाया की ये ग्रह दूर रहते हुए परस्पर एक – दुसरे से सम्बंधित है और ये सभी ग्रह सूर्य की परक्रमा करते रहते है । यही नहीं, अपितु उसने यह अनुभव किया की इन ग्रहों के भ्रमण से ही वायु मंडल में परिवर्तन आता है और इन्ही के प्रभाव के फलस्वरूप ऋतुएं, मास आदि का अंतर बनता है इसक बाद उसने इनके बारे में और विशेष खोज प्रारम्भ की तो उसने पाया की ये ग्रह सामान्य गतिशील ही नहीं है अपितु इनका प्रभाव मानव जीवन से भी सम्बंधित है ।

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